धनतेरस -धनतेरस पूजा का शुभ मुहूर्त 2019 , धनतेरस कब है

Dhanteras 2019 | Dhanteras Shubh Muhurat & Puja Timing

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धनतेरस -धनतेरस पूजा का शुभ मुहूर्त 2019 , धनतेरस कब है

धनतेरस के शुभ मुहूर्त:- (dhan teras ke shubh muhurat)

दि.  25 /10/2019 शुक्रवार धनतेरस पूजा मुहूर्त  07:17  से 08:36 समय अवधी 1घंटा 19 मिनिट

लक्ष्मी पूजन मुहूर्त : सुबह 06:48 A.M. से 11:05 A.M. (चल, लाभ,अमृत) दोपहर को 12:31 P.M. से 01:56 P.M.(शुभ) 04:48 P.M. से 06:13 P.M. (चल) शाम को 09:22P.M. से 10:57P.M. (लाभ) रात्रि को 12:31A.M. से 05:14A.M. (शु.अ.च.)  

यम दीपम प्रदोषकाल 06:05 A.M. से 08:36 A.M. वृषभ काल 07:17A.M.  से 09:16A.M.  रात को 12:22P.M.  से 09:57P.M. शुभ चोघडीया हैं.

(Date 25/10/2019 Friday Dhanteras Puja Muhurat Time 07:17 P.M. To 08:36 P.M. Time duration 1 Hour 19 Minutes)

धन तेरस के दिन पूजा किया हुआ धन लेने का मुहूर्त

दिनांक.२६ / १० / २०१९, शनिवार.

समय सुबह ०८: ०८  से ०९: ३२ तक.

धनतेरस का यह बड़ा पर्व हिंदुओं का एक प्रमुख त्यौहार है.

दिवाली से पहले आसो वदी तेरस को धनतेरस कहते है. यह दिन का एक खास महत्त्व है.

भगवती महालक्ष्मीदेवी धन्वन्तरिभगवान की   विधिविधान से पूजा करते हैं.यह  पूजा करने से आपका किस्मत चमकता है पुरे वर्ष तक धन धान्य की कमी नही होती है. आपकी किस्मत चमकानेवाली धनतेरस की यह पूजा है. यह दिन धनतेरस को धन की पूजा करने का बड़ा महत्व है.

हिंदू कैलेंडर विक्रम संवत के मुताबिक धनतेरस दिवाली के २ दिन पहले मनाया जाता है.

धन का मतलब समृद्धि और तेरस का मतलब तेखा दीन होता है. धन की पूजा करने से १३ गुना धन बढ़ता है. यानी धन की पूजा से आपके धन में वृद्धि होती है.

दूसरा धनतेरस का महत्व (Dhan Teras)

आरोग्य के लिए धनवंतरी भगवान की पूजा की जाती है. अखूट संपति के लिए कुबेर भगवान की पूजा की जाती है.     

        भगवान धनवंतरी का जन्म धन तेरस के दिन हुआ था.

भागवत पूराण के अनुसार देव और दानवो ने समुद्र मंथन किया इस समय पर भगवान धनवंतरी अमृत कलश लेकर बहार निकले.

यह कलश में से आयुर्वेद की उत्पत्ति हुई और  आयुर्वेदिक वनस्पति का उदभव हुआ और यह वनस्पति    में से कुछ ऐसी वनस्पति है इससे सुवर्ण भी बनता है और अनेक प्रकार की धातु भी बनती है. यह पर्व धनतेरस का इस सोने-चांदी की धातु के आधार पर सभी देश वासीयो चांदी-सोने का बर्तन खरीदना शुभ मानते है.

एक ऐसी भी मान्यता है कि पुराने बर्तन बेचकर नए बर्तन खरीदना धनतेरस के दिन शुभ माना गया है.

यू तो सभीलोग बर्तन खरीदते हैं. परंतु खास करके चांदी का बर्तन खरीदना ज़्यादा शुभ माना गया है.

दूसरी एक पौराणिक कथा के अनुसार भगवान विष्णु मृत्युलोक में विचरण कर रहे थे. तब भगवान विष्णु ने अपने साथ लक्ष्मीजी को चलने का आग्रह किया पर लक्ष्मीजी को एक शर्त रखी, कि आपको मेरे साथ आना है तो जो में कहू वो आपको मानना पड़ेगा यानी मेरी आज्ञा का आपको पालन करना होगा. यह विष्णु भगवान की बात का लक्ष्मीजी ने स्वीकार किया.

फिर दोनों विष्णु भगवान और लक्ष्मीजी पृथ्वी पर आए. कुछ देर तक विचरण किया और बाद में विष्णु भगवान ने लक्ष्मीजी को कहा की जब तक मैं यहाँ वापस ना   आऊँ तब तक आप यहाँ पर ही रहोगे और आप पीछे मुड़कर मत देखना.  

यह बात लक्ष्मीजी को समझाकर विष्णु भगवान दक्षिण दिशा की और निकल पड़े.

लेकिन लक्ष्मीजी को मन मे कुछ जानने की उत्सुकता हुई की विष्णुजी दक्षिण दिशा में ऐसा क्यों गए यह दिशा में ऐसा क्या है की मुझे मना करके गए.

यह बात को लेकर लक्ष्मीजी की उत्सुकता ज्यादा बढ़ गई लक्ष्मीजी से रहा नहीं गया और विष्णुभगवान की ओर लक्ष्मीजी चल पड़ी. कुछ ही देर पर रास्ते में जाते समय सरसों का खेत दिखाई दिया. यह सरसों का खेत पूरे  पीले पुष्प से पीला रंग का आबेहुब दिखाई दिया. यह सभी पुष्पों में आकर्षित करने वाला आकर्षण था. पुष्प में आकर्षण से आकर्षित होकर लक्ष्मीजी वहाँ गइ. सरसों का पुष्प की शोभा से मुग्ध हो गइ. पुष्पों को देखकर लक्ष्मीजी को शृंगार करने का मन हुआ. पुष्प को चुटकर  शृंगार किया और लक्ष्मीजी आगे चल पड़े. थोड़े दूर आगे जाने के बाद गन्ने (शिरडी) का खेत देखा इस खेत में सभी गन्ने खड़े थे. इसमें से चार गन्ने का शाठा लिया  और एक एक पिराई लेके लक्ष्मीजी इस गन्ने का रस चूसने लगी.

यह सब लक्ष्मीजी का वर्तन देखकर उसी क्षण विष्णुजी वहा आ गए विष्णुजी ने लक्ष्मीजी को पहले कहा की आप को मैंने यहाँ आने के लिए मना किया था. फिर भी आप यहाँ क्यों आये. फिर विष्णुजी ने कहा की यह किसान का खेत था आपने किसान के खेत में से चोरी की है. इसके बदले में आपको में श्राप देता हु की जो किसान के खेत में आपने चोरी की है इसके बदले में आपको १२ वर्ष तक किसान के खेत में सेवा के रूप में काम करना है. यही आपकी सजा है. अब विष्णुजी का कहा लक्ष्मीजी कैसे टाल सकती है.

फिर जाने का निश्चय लक्ष्मीजी ने कर लिया.

लक्ष्मीजी किसान के घर पर गई लक्ष्मीजी ने देखा की यह किसान तो बहुत दरिद्र है. दरिद्रता को देखकर लक्ष्मीजी ने मन में सोचा कि आपने मुझे शरण दी है मैं आपको समृद्ध  और धनधान्य से परिपूर्ण कर दुंगी. पैसों से में  आपको मालामाल कर दुंगी.

फिर एक दिन लक्ष्मीजी ने किसान पत्नी को कहा, तुम स्नान करके पवित्र हो जाओ मेरी बनाई हुई देवी लक्ष्मीजी की मूर्ति का आप पूजन करो पूजन करने के बाद फिर आप सभी रसोई बनाना इसी तरह पूजा करने से आपको जो आप मांगोगी वो आपको मिलेगा. किसान पत्नी ने माता लक्ष्मीजी ने जो बताया था. यह पूजा इसी प्रकार विधिवत करी माताजी के आदेश अनुसार पूजा करने से  ऐसा माना जाता है कि भोजन बनाने से पहले लक्ष्मी पूजन करना चाहिए और बाद में भोजन बनाएँ. यह धनतेरस की पूजा इसी प्रकार करने से धन बरसाएगी और फलदाई बनेगी.

किसान की पत्नी को माताजी ने जो बताया वह किया दूसरे ही दिन अन्न, रत्न, स्वर्ण, चांदी, धन विगेरे से घर भर गया. इसी प्रकार लक्ष्मीजी के १२ वर्ष पूर्ण हो गए. विष्णुजी लक्ष्मीजी को लेने आए. किसान ने भेजने से इनकार किया. लक्ष्मीजी भी किसान की मर्जी के बिना विष्णुजी के साथ जाने के लिए तैयार नहीं थी. तब विष्णुजी ने चतुराई की जिस दिन फिर से लक्ष्मीजी को लेने के लिए आए उस दिन वारुणी पर्व था. किसान को वारुणी पर्व समझाते हुए कहा तुम परिवार सहित गंगा में जाकर स्नान करो और इन कोडियो को पवित्र जल में छोड़ देना. जब तक आप नहीं लौटेंगे तब तक मैं लक्ष्मीजी को नहीं लेकर जाऊंगा. जैसे भगवान ने कहा था इसी तरह किसान ने किया.

चार कोड़िया लेकर किसान निकल पड़ा. फिर वो गंगा नदी के किनारे गया मन में किसान को आश्चर्य हुआ,

यह तो कोई देवी माँ हैं ऐसा मुझे लगता है यह बात सोचकर किसान से रहा नहीं गया, और गंगाजी को पूछा है की है देवी ये चारकोडी का महत्व क्या है और ये कोडी किसकी है यह बात सुनकर गंगाजी देवी बोल पड़े यह जो कोड़िया आपको जिसने दी है. वह कोई सामान्य स्त्री नहीं है. तुम्हारे घर जो स्त्री आई है वह साक्षात लक्ष्मीजी है और जो लेने आए हैं वह भगवान विष्णु है. यह सुनकर किसान तुरंत वापस गया और वापस जाकर लक्ष्मीजी का आंचल पकड़ लिया और कहा की मैं आपको जाने नहीं दूंगा.

परंतु लक्ष्मी तो चंचल है वो तो कहीं भी नहीं ठहरती है. चलते रहना तो इसका काम है. बड़े-बड़े लोग, बड़े-बड़े महापुरुष, बड़े-बड़े महाराजा लक्ष्मीजी को रोक नहीं सके तो फिर किसान की तो बात ही क्या है.

विष्णु भगवान ने कहा मेरा श्राप १२ वर्ष का था वह आज  पूरा हो गया. अब मैं विष्णु भगवान के साथ जाऊंगी जाते जाते लक्ष्मीजी ने कहा कि अगर मुझे रोकना चाहते हो तो मैं कहूँ वैसा आप करो, कल तेरस तिथि है और यह तेरस तिथि के दिन घर को लिप-पोतकर स्वच्छ रखना. रात को दीपक जलाकर रखना और सायंकाल को मेरी पूजा करना. एक तांबे के कलश में रुपया भरकर रखना. यह रुपया कलश में ही रखना है. इस कलश को आप पूजन करने के बाद तिजोरी में रख देना. यानी आप धनतेरस की पूजा करते हो तो मुद्रा-रूपया-सिक्का से भरा हुआ कलश तिजोरी में ही रखना है तो में भगवती लक्ष्मीजी आपके घर में निवास करुगी. मुद्रा-रूपया-सिक्का भरा हुआ कलश लक्ष्मीजी की कमी कभी महसूस नहीं कराएगा.

किसान और उनकी पत्नी ने घर में यह कलश मुद्रा-रूपया-सिक्का से भरा हुआ रखा धनधान्य से परिवार पूर्ण हुआ.

जाते जाते माताजी ने कहा कि मैं दिखाई नहीं दूंगी. लेकिन मेरी पूजा इस धनतेरस के दिन करना जो भी व्यक्ति मेरी पूजा धनतेरस के दिन करता है. इसका घर  धन से परिपूर्ण कर दूंगी.

किसान की पत्नी को कहा माताजी ने की आपने इस दिन मेरी पूजा की है. इसलिए मैं वर्षभर यहाँ से जाऊंगी नहीं. अगर आपको भगवती लक्ष्मीजी की कृपा प्राप्त करनी है  तो प्रतिवर्ष धनतेरस के दिन मेरी पूजा करें. इस कथा के आधार पर और यही मान्यता के उपर धनतेरस के दिन लक्ष्मी पूजा की जाती है.

दूसरा एक और भी रहस्य है धनतेरस के दिन का बताया है वैदिक परंपरा के अनुसार यमराज की पूजा की जाती है. पूरे वर्ष में एक ही बार यमराज की पूजा होती है. रात्रि के समय में गेहूँ का थोड़ा आटा लेना है और आटा बांधकर दीपक के पात्र के जैसा (कोडिया) बनाना है. इसमें रू की चार बत्ती तेल में डूबाकर इस पात्र में रखकर दीपक के जैसा पात्र गेहूं के लोट के अंदर से बनाया है इसमें रखकर प्रजवलित करना है.

यह दीपक दक्षिण दिशा में रखकर यमराजा का पूजन करना है.

और यमराजा को प्रार्थना करनी है कि हमारे परिवार में आप दया दृष्टि बनाए रखें. किसीकी अकाल मृत्यु न हो.ऐसी प्रार्थना वंदन यमराज को करे और गुड़ का नैवेद्य यमराज को अर्पित करे. यह यमराज की पूजा धनतेरस के दिन अवश्य करनी चाहिए.

मुहूर्त के अनुसार देखते हुए लाभ चोघडीया ०८: ०७ से ०९: ३२ तक है. उसके बाद ०९: ३२ से १०: ५७ अमृत चोघडीया है. दोपहर १२: २२ से ०१: ४७ शुभ चोघडीया हैं.

 

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