Kalsarp Bhag 1 (कालसर्प भाग -1)

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कालसर्पभाग -1

वराहमिहिर ने अपनी संहिता में कहा की कुंडली मे रेखा मे पंच स्थान खाली होना चाहिए, तो काल सर्प योग बनता है|


जन्म कुंडली मे राहु और केतु के बीच सभी ग्रह होने से कालसर्प योग बनता है|

जातक नव संयोग सर्प योग का उल्लेख किया है|

कल्याण वर्मा ने अपनी बहुमूल्य रचना सारावली में सर्प योग की विशाल व्याख्या की है|

शांति रत्न ने “कालसर्प योग” को केवल मान्य ही नहीं किया अपितु कालसर्प

शांति को जातक के लिए जनन शांती बताया है| कहीं नाड़ी ग्रंथों में भी ‘कालसर्प योग’ का समर्थन किया है|

जैन ज्योतिष शास्त्र में कालसर्प की व्याख्या है स्वर्गीय माणिकचंद जी जैन अपनी राहु केतु संबंधी
किताब में ‘कालसर्प योग’ को माना है|

उनके अनुसार सूर्य ग्रहण या चंद्र ग्रहण के समय जो स्थिति पैदा होती है|

वही स्थिति ‘कालसर्प योग’ के कारण जातक के जन्म में होती है|

कालसर्प योग सर्व साधारण रूप से किसी ने भी अच्छा नहीं माना है|

कालसर्प योग वाले जातक दूसरे के लिए जीते |

अपने लिए कोई सुख उपयोग उन्हें प्राप्त नहीं होता, ” स्वान्तह सुखाय” जीने के लिए ही अपना जीवन है

ऐसा मानने वालों को कालसर्प योग दुखदाई नहीं सिद्ध होगा परंतु मुश्किल से मिले इस जन्म को कौन दूसरों के लिए जीने में अपने जीवन की सार्थकता मानेगा ऐसा होता है|

तो आज करोड़ो रुपए के घोटाले ही नहीं होते राहु केतु को लेकर जो पौराणिक कथा है|

उसका अध्ययन किया जाना चाहिए पाश्चात्य ज्योतिरविंद ने भी राहु- केतु को “कार्मिक” माना है|

एवं व्यक्तिगत जीवन पर होने वाले उनके परिणामों को मान्य किया है |

“कार्मिक ज्योतिष” राहू पृथ्वीवर काल हे, ‘के तू’ सर्प है|

इनके द्वारा हमने पिछले कर्मों का बढ़ना राहु सर्प का प्रतिनिधि है यह बात ज्योतिष शास्त्र साहित्य में राहु के प्रभाव में कही गई है|

राहुके प्रभाव मे रहेने वाले जातक सर्प से डरते हैं |

उन्हें सपनों में सर्प दिखाई देते हैं| सर्प कौन हैं?

ज्योतिष शास्त्र और अध्यात्म शास्त्र में सबको केतु का प्रतीक माना है|

इससे हिंदू ज्योतिष शास्त्र में वर्णित कालसर्प योग को समझा जा सकता है|

काम रत्न के १४के श्लोक मे राहू को काल कहा हे|

श्लोक ५० मे कहा गया हे — काल या ने मृत्यु |

शनि-सूर्य और राहु जन्माँग मे लग्नमेसप्तमस्थानमें होने पर सर्पदंश होता है हमारे
प्राचीन ग्रंथों में राहु केतु के अधीदेवताऔर प्रत्याधिदेवता माना है|

किसी भी ग्रह का पूजनके लिए उसे ग्रह के अधिदेवता एवं प्रत्याधि देवता का पूजा अनिवार्य है|

इसलिए राहु शांति को कालसर्प शांती में अनिवार्य माना है|

कालसर्प शांति जन्म शांति हे इसे नकारानहीं जा सकता, वास्तव में राहु केतु छाया ग्रह
उनकी अपनी दृष्टि नहीं है|

राहु का जन्मनक्षत्रभरणी और और केतु का जन्म नक्षत्र आश्लेषा है राहु के जन्म भरणीनक्षत्र के देवता काल है|

और केतु के जन्म नक्षत्र आश्लेषा का देवता सर्प है |

राहु केतु के जो फलितफल मिलते हैं|

उनको राहु केतु के नक्षत्र देवताओं के नामों से जोड़कर कालसर्प योग कहा जाए तो
इसमें आपत्तिजनक या अ शास्त्रीय नहीं हे |

राहु के गुण अवगुण शनि जैसे हैं, जीसस्थान में जिस ग्रह की युति में होगा उस वक्त शनि का परिणाम देता है|

शनि आध्यात्मिक चिंतनविचार एवं दीर्घविचार एवमगणित के साथ आगे बढ़ने का गुण अपने आप मे रखता है|

यही बात राहु की है| राहु की युति किसी ग्रह के साथ है वह किस स्थान काअधिपति है|

यह देखना होगा राहु मिथुन राशि मे उच्च, धन राशि मे नीच और कन्या राशि में स्वग्रही कहेलाताहे |

राहू के मित्र शनि,बुध ओर शुक्र हे |गुरु उनके बराबर ग्रह हे |

सूर्य,चन्द्र,मंगल उनके शत्रु ग्रह हे |उनके स्थान अथवा साथ मे युति करने वाले ग्रह
इसका अमल होता हे|

केतु के परिणाम ऐसे ही हे| केतु में मंगल गुण धर्म हे| मंगल शुक्र केतु के मित्र
हैं|

चंद्र बुध गुरु उनके सम ग्रह सूर्य शनि राहू शत्रु हे |

कालसर्प योग जिसके जन्मांग मे है, ऐसे व्यक्ति को अपने जीवन में काफी संघर्ष करना पड़ता है | और प्राप्त होने वाली प्रगति में रुकावट आती है|

बहुत ही विलंब से यश प्राप्त होता है|

मानसिक शारीरिक एवं आर्थिक त्रिविध रूप से व्यक्ति मानसिक परेशान होता है|

कालसर्प योग की कुंडली धारण करने वाले जातक का भाग्य-प्रवाह राहु केतु अवरुद्ध करते हैं|

इस कारण जातक की उन्नति नहीं होती, उसे कामकाज नहीं मिलता।

कामकाज मिल जाए तो उसमें अनंत अड़चनें उपस्थित होती है, परिणामस्वरूप उसे अपनी जीवनचर्या चलाना मुश्किल हो जाता है,

उसका विवाह नहीं होता। विवाह हो भी जाए तो संतानसुख में बाधा आती है।विवाह जीवन में कटुता आकर अल गाव रहता है|

कर्ज का बोज उसके कंधों पर रहेता है, और अनेक प्रकार के दुख भोगने पड़ते हैं,

जाने अनजाने में किए गए हुए कर्मों के फलस्वरूप दुर्भाग्य का जन्म होता है, दुर्भाग्य चार प्रकार के होते हैं,

पहला दुर्भाग्य संतान अवरोध के रूप में प्रकट होता है|

दूसरा दुर्भाग्य को लक्षण एवं कलहप्रिय पति या पत्नी का मिलना है|

तीसरा दुर्भाग्य कठोर परिश्रम का फल न मिलना धन के लिए तरसना है|

चौथा दुर्भाग्य शारीरिक एवं मानसिक दुर्बलता के कारण निराशा की भावना जागृत होना है|

वह अपने जीवित शरीर का बोझ धोते हुए शीघ्र अतिशीघ्र मृत्यु करना चाहता है|

दुर्भाग्य के उपचार और लक्षण कालसर्प योग में स्पष्ट रूप में प्रतीत होते हैं|

कालसर्प योग पीड़ित जातक दुर्भाग्य से छुटकारा पाने के लिए उपायों का सहारा लेता है|

डॉक्टर के पास पहुँचता है धन प्राप्त के उपाय सोचता है|

उसके लिए आवश्यकता है बार-बार प्रयास करने पर भी सफलता मिलने के लिए उसका ध्यान, शास्त्र की ओर आकर्षित होता है|

अपनी जन्मपत्री से वो दोष ढुढता हे | जन्मपत्री मे कौन कौन से कुयोग हे |

पूर्व जन्म कृत सर्पशाप, ,पितृशाप, भ्रातृशाप, ब्रह्मशाप, इत्यादि शापों मे से कोई शाप उसकी कुंडली मे नहीं हे ।

इसके लिए ज्योतिष के पुछताज करता हे |विभिन्न धार्मिक अनुष्ठान शुभ कर्म फलदायी क्यों नहीं हो
रहे हैं|

इसका पता लगाने के लिए कोशिश करता है। तब उसे स्पष्ट रूप से कुंडली में दिखाई देता है।”कालसर्प योग”

जब व्याधि की चिकित्सा औषधीय उपायो से नहीं हो पाती तो कर्मजरोग,कर्मज व्याधि को मानना पड़ता है|

योग रत्नाकर का एक कथन है| इस विषय में बहुत ही अच्छे योग रत्नाकर कहता है|

कोई मानने से या ना मानने शास्त्र सिद्धान्त न कभी बदलते हे और नहीं कभी बदले हे | काल सर्प योग स्वयं प्रमाणित हे |

इसे और अधिक प्रमाणित करने की जरूरत नहीं हे| शास्त्र शास्त्र हे इसे कोई माने या न
माने |

ज्योतिष शास्त्र का अध्ययन, संशोधन करने वाले आचार्यों ने सर्प का मुंह राहु और केतु इन दोनों के
बीच में सभी ग्रह रहने पर निर्माण होने वाली ग्रह स्थिति को कालसर्प योग कहा है|

या काल सर्प योग मूल सर्प योग का ही स्वरुप है|

जातक के भाग्य का निर्णय करने में राहु केतु बड़ा योगदान है|

तभी तो विंशोंत्तरी महादशा में 18 वर्ष एवं अष्टोत्तरी दशा में 12 वर्ष हमारे आचार्यों ने राहु दशा के लिए निर्धारित किए हैं |

दो तमोगुण एवं पापीग्रहों के बीच में अटकेहुए सभी ग्रहों की स्थिति अशुभही रहती है|

” कालसर्प योग” के परिणामस्वरुपका अलग होना उसका जीवन में संघर्ष से ओत-प्रोत रहना,

एवं अर्थाभाव रहना एहिकसुखों का अभाव रहना– ऐसे फल प्राप्त होते हैं यह मेरा निजी अनुभव के
अनुसार राहु केतु ग्रह एक ही नक्षत्र में हो तो परिणाम की तीव्रता कम होती है ।

यह मेरा प्रदीर्घ एवं निजी अनुभव हे | राहु केतु की छाया ग्रह होते हुए भी नवग्रहोंमें उनका स्थान दिया है।

दक्षिण में तो राहुकाल सभी शुभ कार्यों के लिए निषेध माना जाता है।

जो जब काल यानी मृत्यु समीप हो तो सर्प दंश होने के मौके आते हे ।इसीलिए हम कालसर्प योग
कहते हे |

कालसर्प योग से मानते हैं कालसर्प काल निकाल दिया जाए तो बाकी बचता है यानी सर्प दोष
रह जाता है,

परंतु यह दोनों शब्द है प्रभु रामचंद्र जी को 14 साल वनवास में साथ देने वाले लक्ष्मण जी शेषनाग के अवतार थे शेषनाग के साथ के बिना रामसीता का का वनवास अधूरा था |
क्रमशः